व्यसन का अर्थ है मन की गुलामी

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साधारणतः ‘व्यसन’ शब्द का प्रयोग नकारात्मक अर्थों में किया जाता है। इसे शराब और तम्बाकू जैसे मनोसक्रिय पदार्थों के सम्बन्ध में परिभाषित किया गया है, जो यदि अन्तर्ग्रहण हो जाते हैं, तो उनका सेवन करने वाले व्यक्ति के भाव और/या धारणा को बदल देते हैं।

परन्तु व्यसन शब्द अपने सही अर्थों में, केवल शराब और नशीले पदार्थों आदि तक ही सीमित नहीं है। कोई व्यक्ति जुआ, एक विशेष प्रकार का भोजन जैसे चॉकलेट या कॉफी, मैथुन, अश्लील साहित्य, कम्प्यूटर, विडियो गेम, इन्टरनेट, कार्य, व्यायाम, टीवी, खरीदारी और यहां तक कि आध्यात्मिकता का भी आदी हो सकता है। प्रातः शीघ्र जागना और मंदिर या गिरिजाघर जाने जैसे तथाकथित अच्छे व्यसन भी हो सकते हैं जिनकी लोग प्रशंसा कर सकते हैं ।

यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यह भेद कैसे किया जाए कि कोई व्यसन अन्ततः अच्छा है या बुरा। आधुनिक, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, एक बुरी लत की विशेषता व्यवहार नियन्त्रण में कमी, लालसा, लगातार परहेज करने में असमर्थता, और किसी के व्यवहार और पारस्परिक सम्बन्धों के साथ एक महत्वपूर्ण समस्या की कम पहचान है। दूसरे शब्दों में, व्यसन एक व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य, मानसिक या सामाजिक जीवन में हानिकारक परिणामों के बावजूद एक विशिष्ट गतिविधि में संलग्न होने के लिए एक आवर्ती मजबूरी है ।

योग के मनोविज्ञान के अनुसार अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के व्यसनों से बचना चाहिए क्योंकि दोनों ही भौतिक संसार में बद्ध करते हैं। ऋषि पतन्जलि ने अपने योग सूत्र में कहा है कि हम अपनी इन्द्रियों से जो कुछ भी आन्तरिक और बाह्य अनुभव करते हैं उनको पाँच समूहों में विभाजित किया जा सकता है जिन्हें वे वृत्ति या मन की अवस्था कहते हैं। उनके अनुसार, जब भी हम कुछ अनुभव करते हैं, तो वह मन की स्थिति में बदलाव लाती है। धारणा में मन प्रमुख साधन है। मन बोधित वस्तु विशेष का आकार लेता है। मन की तुलना उस द्रव से की जाती है जो उस पात्र का रूप धारण कर लेता है जिसमें उसे डाला जाता है। इस आकृति को वृत्ति कहते हैं।

एक विशेष वृत्ति एक क्षण के लिए रहती है और नई धारणा की वृत्ति द्वारा प्रतिस्थापित की जाती है। लेकिन, इससे पहले कि एक वृत्ति को एक नई वृत्ति से बदल दिया जाए, यह चित्त या हृदय में संस्कार नामक एक छाप छोड़ जाती है। यह संस्कार बाद में किसी विशेष वस्तु या क्रिया के हमारे स्मरण का आधार है। यदि हम कोई क्रिया बार-बार करते हैं, तो हम उस क्रिया के संस्कारों को अपने चित्त में दृढ़ करते हैं। जब हम पहली बार कोई क्रिया करते हैं, तो हम उसके प्रति बहुत सचेत होते हैं। परन्तु यदि हमने इसे कई बार किया है, तो हम बिना अधिक जागरूकता के उस क्रिया को कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब हम प्रथम बार साइकिल चलाना सीखना आरम्भ करते हैं, तो हम सवारी के कार्य पर बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं। हम और कुछ नहीं सोच सकते हैं। परन्तु एक बार जब हमने इसे चलाना सीख लिया और अधिक समय तक चलाने का अभ्यास किया, तो हम अपनी नौकरी या किसी अन्य योजना को अन्जाम देने के बारे में सोचते हुए साइकिल की सवारी कर सकते हैं। हम शायद ही कोई ध्यान देते हैं और लगता है कि सब कुछ अपने आप हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बार-बार साइकिल चलाकर हमने साइकिल चलाने के गहरे संस्कार बनाए हैं। सवारी एक रिफ्लेक्स बन जाता है और हमें अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती है। हमने सवारी की आदत विकसित की है।

नशा इसी तरह कार्य करता है। इसके विषय में जागरूक हुए बिना साइकिल की सवारी करने और व्यसन के बीच एकमात्र भेद नशे की गतिविधि से पुरस्कार (जैसे किसी के अहंकार को आराम) है। यदि साइकिल की सवारी का उपयोग उस प्रकार की राहत या पुरस्कार के लिए किया जाएगा, तो इसे भी एक लत माना जाएगा। तो, व्यसन का अर्थ राहत या पुरस्कार पाने के लिए किया गया कोई भी बाध्यकारी कार्य होगा। यदि ऐसी क्रिया स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, व्यवहार नियंत्रण में हानि है, तो यह एक अवांछनीय लत है। यह अपराधबोध, शर्म, भय, निराशा, असफलता, अस्वीकृति, चिन्ता, अपमान और अवसाद को जन्म दे सकता है। परन्तु, अगर यह किसी के स्वास्थ्य, धन, स्थिति या जागरूकता में सुधार करता है, तो यह एक स्वागत योग्य लत हो सकती है। वास्तव में, एक व्यक्ति स्वयं या अन्य लोग इसे एक लत के रूप में नहीं पहचान सकते हैं।

परन्तु अध्यात्म की दृष्टि से दोनों प्रकार के व्यसनों को अन्ततः छोड़ देना चाहिए। अध्यात्म का लक्ष्य व्यक्ति को सभी प्रकार के अच्छे और बुरे संस्कारों से मुक्त करना है क्योंकि दोनों ही भौतिकवाद का हिस्सा हैं। चाहे कोई रेशम की रस्सियों से बँधा हो या लोहे की जंजीरों से, कोई स्वतन्त्र नहीं है। मुक्त होने के लिए दोनों को छोड़ना होगा। इसलिए, व्यसनी तरीके से (नियम-आग्रह) आध्यात्मिक नियमों और विनियमों का पालन करना भी आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए एक बाधा के रूप में माना जाता है।

हमें अपने कार्यों को जागरूकता के साथ करना चाहिए; नहीं तो हम अपने ही मन के गुलाम बन जाते हैं। व्यसन का अर्थ है मन का गुलाम बनना। खुश, स्वस्थ और समृद्ध होने के लिए हमें इस गुलामी से छुटकारा पाना होगा और सही मायने में एक स्वतन्त्र नागरिक बनना होगा।

  • सत्यनारायण दास

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  • Satyanarayana Dasa

    Satyanarayana Dasa
  • Daily Bhakti Byte

    आप बुद्धिमान हो सकते हैं, परन्तु जब एक संस्कार सक्रिय हो जाता है तब आप अपनी बुद्धि खो देते हैं एवं संस्कार की भावना आपको पूरी तरह से अभिभूत कर देती है । तब आप एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करते हैं। परन्तु अधिकांश व्यक्तियों को इसका अनुभव नहीं होता है, अतएव वे उस व्यक्ति को दोष देते हैं जिसने उनके संस्कार को सक्रिय किया । वे यह सोचते हैं कि संस्कार को सक्रिय करने वाले में ही समस्या है।

    — बाबाजी सत्यनारायण दास
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